Cinema, Caste & Narrative Politics: Brahmin अब नया Soft Target है?

आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)
आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)

भारत में बहसें अक्सर मुद्दों पर नहीं, targets पर चलती हैं। हर दौर में एक ऐसा समुदाय चाहिए होता है, जिसे दोषी ठहराकर बाकी समाज को नैतिक सुकून दिया जा सके। कभी यह भूमिका किसी और के हिस्से आती थी, लेकिन पिछले कुछ समय से Brahmin community एक convenient soft target बनती जा रही है।

यह कहना किसी और की पीड़ा को नकारना नहीं है। यह सिर्फ इतना बताने की कोशिश है कि न्याय selective नहीं हो सकता।

Social Media से Ground Reality तक

आज social media खोलिए, memes, reels, sarcastic posts और half-baked opinions की एक लाइन दिखेगी, जहां Brahmin शब्द punchline बन चुका है। बोलते रहो, दिखाते रहो, exaggerate करते रहो। जैसे जवाब देने या सवाल पूछने का हक ही खत्म हो गया हो।

Problem criticism नहीं है। Problem generalisation है।

History को Conveniently Ignore क्यों किया जाता है?

अगर इतिहास के पन्ने ईमानदारी से पलटे जाएं, तो तस्वीर अलग दिखेगी। हजारों Brahmins ऐसे मिल जाएंगे जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण दिए। समाज सुधार के लिए सत्ता और परंपरा से टकराव लिया। शिक्षा, विज्ञान, आंदोलन और संस्कृति में निर्णायक योगदान दिया। लेकिन ये किरदार अक्सर फिल्मों और debates में जगह नहीं पाते, क्योंकि ये villain narrative को कमजोर कर देते हैं।

Cinema: Art या Agenda?

Cinema एक powerful medium है। लेकिन जब storytelling से ज़्यादा symbolism हावी हो जाए, तो सवाल उठते हैं। एक flawed character दिखाइए बिल्कुल सही। लेकिन जब उस flaw को caste label से जोड़ दिया जाए, तो यह art नहीं, agenda framing बन जाता है।

“हवस का कोई जाति प्रमाणपत्र नहीं होता।”

हवस, लालच और सत्ता — ये Universal हैं

सिनेमा वालों से एक सीधी बात हवस सिर्फ पुजारी की बपौती नहीं है। हवस किसी भी इंसान पर सवार हो सकती है चाहे वो किसी भी caste, profession या background से हो। पुजारी वो होता है जो मंदिर में पूजा करता है। अपराध व्यक्ति करता है, जाति नहीं।

जब आप व्यक्ति से आगे जाकर पूरी पहचान को दोषी ठहराते हैं, तो आपकी समझ और मंशा — दोनों सवालों के घेरे में आ जाती हैं।

Ground Reality बनाम Studio Reality

मेरे घर की हकीकत कुछ और रही है। मेरे पुरखों और बुजुर्गों ने कभी “समझ की रेखा” नहीं खींची। न कभी घर में दो तरह के बर्तन थे, न कभी इंसान को इंसान से कमतर समझा गया। लेकिन irony ये है कि जो लोग ground reality में कभी रहे ही नहीं, वही सबसे ज़्यादा moral lecture दे रहे हैं।

Selective Outrage: असली समस्या यहीं है

जब किसी और community पर stereotype होता है, तो उसे Problematic कहा जाता है। Harmful narrative बताया जाता है। Apology और edits की मांग होती है। लेकिन जब Brahmin को निशाना बनाया जाता है, तो वही चीज़ Bold cinema बन जाती है। Brave storytelling कहलाती है। Artistic freedom का झंडा उठा लिया जाता है। यही double standard सवाल खड़े करता है।

Equality का मतलब क्या सिर्फ Direction बदलना है?

अगर हम सच में equality की बात कर रहे हैं, तो principle हर जगह एक जैसा होना चाहिए। गलत portrayal गलत है चाहे वो किसी के लिए भी हो। लेकिन अगर equality का मतलब सिर्फ target बदल देना है, तो ये न्याय नहीं, ये narrative politics है।

Brahmin = Minority? एक असहज सच्चाई

आज irony ये है कि discourse में Brahmin को ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे वो हर जगह dominant हो, हर सिस्टम में powerful हो। Ground reality इससे कहीं ज़्यादा complex है। हर Brahmin privilege में नहीं जीता, हर Brahmin सत्ता में नहीं बैठा। लेकिन stereotype को nuance नहीं चाहिए उसे सिर्फ एक चेहरा चाहिए।

सवाल जो पूछे जाने चाहिए

क्या हम stereotypes से लड़ रहे हैं या उन्हें बदलकर दोहरा रहे हैं? क्या criticism fact-based है या convenience-based? क्या art सवाल पूछ रहा है या जवाब थोप रहा है? अगर इन सवालों के जवाब ईमानदार नहीं होंगे, तो debate भी ईमानदार नहीं होगी।

Target नहीं, Truth चाहिए

देश को target नहीं, truth चाहिए। Cinema को agenda नहीं, responsibility चाहिए। और समाज को shouting नहीं, nuance चाहिए। अगर हम सच में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो किसी एक को गिराकर नहीं, सबको बराबरी से देखकर ही बढ़ पाएंगे।

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